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Tuesday, August 11, 2015

जब देखो कि प्रभात



"जब देखो कि प्रभात आया है, पंछी  पेड़ों पर चहचहाने लगे हैं फूलों की सुगन्ध बहने लगी है, ठंडी-ठंडी हवा चलने लगी है तो सोचना कि भगवान की तरफ से, भक्ति करने का सदेश आया है। हर सुबह की शुरुआत उसके भजन से, उसके पूजन से करो।"

जब देखो कि प्रभात



"जब देखो कि प्रभात आया है, पंछी  पेड़ों पर चहचहाने लगे हैं फूलों की सुगन्ध बहने लगी है, ठंडी-ठंडी हवा चलने लगी है तो सोचना कि भगवान की तरफ से, भक्ति करने का सदेश आया है। हर सुबह की शुरुआत उसके भजन से, उसके पूजन से करो।"

Monday, August 10, 2015

याद रखीऐ


  • याद रखीऐ जब तक आप ठीक नीद नहीं लेंगे ,हँसेंगे नहीं ऑक्सीजन की मात्रा पूरी नहीं लेंगे आप शान्ति से नहीं रह सकते !

Sunday, August 9, 2015

Fwd: [www.mgg.santvani] brashtachar


---------- Forwarded message ----------
From: Madan Gopal Garga LM VJM <mggarga@gmail.com>
Date: Sun, Aug 9, 2015 at 4:43 PM
Subject: [www.mgg.santvani] brashtachar
To: mggarga@gmail.com





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Posted By Madan Gopal Garga LM VJM to www.mgg.santvani at 8/09/2015 04:43:00 PM

आत्मा का रूप


  • जो नश्वर हे वह शरीर हे , जो चीज मिटती हे वह चैतन्य नहीं हे !
  • जो मिटता नहीं हे वह चैतन्य हे !
  • आत्मा का रूप नहीं बदलता !
  • अनुभव करने वाला शरीर नही हे आत्मा है !
  • जड़ मिटने वाली चीज हे !
  • आत्मा एक ही जगह रहती हे और वहीं से सब कुछ अनुभव करती हे !
  • आत्मा का कोई आकार नही हे ,बाल के आगे का भाग लम्बाई चोडाई में बराबर उसके १०० हिस्से कर लो फिर एक हिस्से के १०० हिस्से कर लो इतनी छोटी है आत्मा !

Thursday, August 6, 2015

गंगा तट पर aik kahani





गंगा तट पर एक ऋषि का आश्रम था, जिसमें अनेक छात्र शिक्षा प्राप्त करते थे। जब शिष्यों की शिक्षा पूरी हो जाती और वे अपने घर वापस जाने लगते



, तो ऋषि से पूछते कि गुरु दक्षिणा में क्या दें? ऋषि कहते कि तुमने जो पाया है, समाज में जाकर उस पर अमल करो,अपने पैरों पर खड़े हो, सच्ची कमाई करो और फिर एक साल बाद तुम्हारा जो दिल चाहे वह दे जाना।

आश्रम छोड़कर जाने के बाद शिष्य अलग-अलग पेशेअपनाते। अपने पेशे, अपने कामकाज से जिसे जो कमाईहोती, उसका कुछ हिस्सा वह श्रद्धापूर्वक ऋषि को दे दियाकरता था। एक बार आश्रम में एक अत्यंत सीधा-सादा शिष्य आया। वह साधारण गृहस्थ था। वह दिन भर मेहनत करके अपने परिवार का पालन पोषण करता था लेकिन उसके अंदर कुछ सीखने की तीव्र इच्छा थी इसलिए वह आश्रम में चलाआया था। उसने अपने व्यवहार से सबका दिल जीत लिया। ऋषि उसे स्नेहपूर्वक पढ़ाया करते थे। जो कुछ उसे सिखाया जाता, उस पर वह मनोयोग से अमल करता था।


जब उसकी शिक्षा पूरी हुई तो उसने भी पूछा, 'गुरु जी दक्षिणा में क्या दूं?' ऋषि ने उससे भी वही कहा जो वह और शिष्यों से कहा करते थे। वह चला गया और एक साल बाद लौटा। बोला, 'दक्षिणा देने आया हूं।' ऋषि उसे देखकर बड़े खुश हुए,फिर उन्होंने पूछा, 'क्या लेकर आए हो बेटा?' उस शिष्य ने दस लोगों को खड़ा कर दिया, जो उसके गांव के थे। उसने कहा, 'मैं गुरु दक्षिणा में ये दस नए शिष्य लाया हूं।' ऋषि ने पूछा, 'किसलिए?' उसने कहा, 'जो शिक्षा आपने मुझे दी थी,मैंने उसे इन तक पहुंचाया। उतने से ही इनका जीवन संवर गया। अब आप इन सब को अपना शिष्य बना लें ताकि इतने लोग और आपके बताए रास्ते पर सही तरीके से चल सकें।'ऋषि ने प्रसन्न होकर कहा, 'तुमने मुझे अब तक की सबसे अच्छी गुरु दक्षिणा दी है।

Wednesday, August 5, 2015

जैसे सांड या भेंसे

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परम पूज्य सुधांशुजी महारा
ज
  • जैसे सांड या भेंसे को आप यह कहें कि इसको सींग मत मारना मगर इसको यह बात समझ में नहीं आती इसी तरह दुनिया सांड या भेंसे की तरह हे वह तो सींग मारेगी ही !

Monday, August 3, 2015

जो हमको



  • जो हमको समझाता हे वह गुरु हे ,वह हमारे ह्रदय के गहराई तक जाकर समझाता हे !

Sunday, August 2, 2015

जिज्ञासु : गुरुदेव ! स्वयं को मूल्यवान बनाने








जिज्ञासु : गुरुदेव ! स्वयं को मूल्यवान बनाने और समाज के लिए स्वयं को उपयोगी बनाने के लिए हमें
क्या करना चाहिए ?

पुज्य गुरुदेव ! आप सबको परमात्मा ने यह जीवन दिया ! इसमें कलाओं का विकास होना चाहिये ! इस जीवन को कीमती बनायें और कीमती बनाने का तरीका क्या हो सकता हे ! प्राण उर्जा को आदमी ने अपनी ईर्ष्या मे ,रोग में,भोग में जलाया ! जबकी इसका उपयोग आत्म उत्थआन के लिए किया जाना चाहिए ! इसके बाद अगला सोपान आता हे मन की दुनिया का ! मानसिक रूप से हम अपने आपको प्रसन्न रखें , खिला हुआ रखें ! अपना बौद्धिक् विकास करें ! बुद्धि तेज हो , लेकिन प्रेम से और धर्म से जुडी हुई हो ! बिगडी हुई बुद्धी अपना भी विनाश करती हे और समाज का भी विनाश करती हे ! इसलिए बुद्धि को धर्म की शरण में लाना चाहिये !


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Saturday, August 1, 2015

जीवन के

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परम पूज्य सुधांशुजी महारा
ज

जीवन के किसी दुःख या ठोकर से इंसान सबक ले ले तो वह ठोकर ठोकर नहीं होती। वह तो आपके लिए एक सीख बन जाती है।

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